टाई-बेल्ट और अंग्रेजी बोर्ड की चमक के पीछे शिक्षा का सच!
रायपुर। प्रदेश में तेजी से बढ़ रहे निजी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की चमक-दमक के पीछे अब शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। बड़े भवन, आकर्षक यूनिफॉर्म, टाई-बेल्ट और अंग्रेजी माध्यम के नाम पर अभिभावकों से भारी फीस वसूलने वाले कई निजी स्कूलों में शिक्षकों की शैक्षणिक योग्यता और विषय दक्षता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में बच्चों को बेहतर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का दावा तो किया जाता है, लेकिन कई संस्थानों में पढ़ाने वाले शिक्षकों के पास निर्धारित योग्यता और आवश्यक प्रशिक्षण का अभाव है। इतना ही नहीं, कुछ स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई कराने वाले शिक्षकों की अंग्रेजी भाषा पर पकड़ भी अपेक्षित स्तर की नहीं होने की शिकायतें सामने आती रही हैं।
प्रदेश में निजी स्कूलों की बढ़ती संख्या के बीच अब स्कूलों की मान्यता, शिक्षकों की योग्यता, आधारभूत सुविधाओं और आंतरिक शैक्षणिक गुणवत्ता की निगरानी को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। माध्यमिक शिक्षा मंडल द्वारा मान्यता और गुणवत्ता से जुड़े मामलों में सख्ती के संकेत दिए जाने के बाद निजी स्कूलों की कार्यप्रणाली पर बहस शुरू हो गई है।
अभिभावकों का कहना है कि वे बच्चों की बेहतर शिक्षा की उम्मीद में निजी स्कूलों को मोटी फीस देते हैं। ऐसे में स्कूल प्रबंधन की जिम्मेदारी है कि बच्चों को पढ़ाने के लिए योग्य, प्रशिक्षित और विषय विशेषज्ञ शिक्षकों की नियुक्ति की जाए। केवल अंग्रेजी माध्यम का बोर्ड लगा देने या स्कूल की आकर्षक इमारत तैयार कर देने से शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं हो सकती।
शिक्षाविदों का मानना है कि निजी स्कूलों की गुणवत्ता का आकलन केवल उनके भवन और सुविधाओं से नहीं, बल्कि शिक्षकों की योग्यता, पढ़ाने के तरीके और विद्यार्थियों के शैक्षणिक परिणाम के आधार पर किया जाना चाहिए। अब जरूरत इस बात की है कि संबंधित विभाग और शिक्षा मंडल ऐसे स्कूलों की नियमित जांच कर नियमों का पालन सुनिश्चित करें, ताकि अभिभावकों से वसूली जाने वाली फीस के अनुरूप बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके।
