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सरकारी राशि के गबन पर कार्रवाई, वसूली अब भी अधूरी

बिलासपुर। जिले में पंचायतों के विकास और जनकल्याण के लिए जारी सरकारी राशि के गबन के मामलों में वसूली की कार्रवाई वर्षों बाद भी अधूरी है। मस्तूरी, बिल्हा, कोटा और तखतपुर जनपद पंचायतों में पूर्व सरपंचों और पंचायत सचिवों से संबंधित गबन के मामलों में 3.14 करोड़ रुपये से अधिक की राशि अब भी वसूली के लिए लंबित बताई जा रही है। सरकारी राशि के दुरुपयोग या गबन के मामलों में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ वसूली आदेश जारी किए जाने के बावजूद राशि की रिकवरी नहीं हो पाने से पंचायत स्तर पर वित्तीय अनुशासन और निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं।

जानकारी के अनुसार, अलग-अलग ग्राम पंचायतों में कार्यों के लिए स्वीकृत राशि, पंचायत मद और अन्य शासकीय योजनाओं से संबंधित राशि के उपयोग में अनियमितता पाए जाने के बाद संबंधित तत्कालीन सरपंचों और सचिवों के खिलाफ कार्रवाई की गई थी। जांच के बाद कई मामलों में शासकीय राशि की वसूली के आदेश भी जारी हुए, लेकिन आदेश के बाद भी पूरी रकम सरकारी खजाने में वापस नहीं आ सकी।

चार जनपदों में वर्षों से अटकी रिकवरी

मस्तूरी, बिल्हा, कोटा और तखतपुर जनपद पंचायतों के अंतर्गत सामने आए मामलों में बड़ी राशि की वसूली लंबित है। कई प्रकरण पुराने होने के बावजूद संबंधितों से पूरी रकम वसूल नहीं की जा सकी है। इससे एक ओर जहां सरकारी धन की वापसी में देरी हो रही है, वहीं दूसरी ओर पंचायतों में वित्तीय अनियमितताओं पर प्रभावी नियंत्रण को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

बताया जा रहा है कि कुछ मामलों में संबंधित पूर्व सरपंच या सचिवों पर गबन की राशि निर्धारित करते हुए वसूली के आदेश दिए गए थे। इसके बाद भी समय बीतने के साथ कई प्रकरण लंबित होते गए। विभागीय स्तर पर वसूली के लिए नोटिस और अन्य प्रक्रियाएं अपनाई गईं, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने से करोड़ों रुपये की सरकारी राशि अब भी अटकी हुई है।

रिकवरी नहीं होने से उठ रहे सवाल

पंचायतों को विकास कार्यों, मूलभूत सुविधाओं और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए विभिन्न योजनाओं के तहत सरकारी राशि उपलब्ध कराई जाती है। ऐसे में यदि इस राशि के गबन या अनियमित उपयोग के बाद भी वर्षों तक उसकी वसूली नहीं हो पाती है तो इससे पूरी व्यवस्था की निगरानी पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है। ग्रामीण विकास से जुड़ी राशि का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के लिए होना जरूरी है, लेकिन वसूली लंबित रहने से संबंधित मामलों में विभागीय कार्रवाई की प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे हैं।

अब जरूरत इस बात की है कि लंबित प्रकरणों की जनपदवार और ग्राम पंचायतवार समीक्षा कर जिम्मेदार लोगों से राशि की वसूली के लिए ठोस कार्रवाई की जाए। पुराने मामलों में यदि संपत्ति या अन्य माध्यमों से राशि की वसूली की प्रक्रिया लंबित है तो उसे भी समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाए, ताकि सरकारी धन लंबे समय तक अटका न रहे।

पुराने मामलों की दोबारा समीक्षा की जरूरत

3.14 करोड़ रुपये से अधिक की लंबित वसूली यह बताती है कि केवल आदेश जारी करना ही पर्याप्त नहीं है। आदेश के बाद उसकी वास्तविक अनुपालना और राशि की रिकवरी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। ऐसे में पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अधिकारियों द्वारा चारों जनपद पंचायतों के पुराने प्रकरणों की समीक्षा कर यह पता लगाया जाना जरूरी है कि किन मामलों में कितनी राशि वसूल हुई, कितनी बाकी है और वसूली में देरी की वजह क्या है।

अब देखना होगा कि वर्षों से लंबित इन प्रकरणों में विभाग कब तक प्रभावी कदम उठाता है और सरकारी खजाने की करोड़ों रुपये की राशि की पूरी वसूली कब तक हो पाती है।

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