जहां कभी गूंजती थी बंदूकों की आवाज, अब सुनाई दे रहा राष्ट्रगान
बस्तर। प्रदेश के माओवादी हिंसा से मुक्त हो रहे दूरस्थ इलाकों में करीब दो दशक बाद शिक्षा की गतिविधियां फिर जोर पकड़ने लगी हैं। जिन क्षेत्रों में कभी बंदूक और बारूद का खौफ लोगों के रोजमर्रा के जीवन पर हावी रहता था, वहां अब स्कूलों में बच्चों की आवाज, प्रार्थना, राष्ट्रगान और पढ़ाई का माहौल नजर आने लगा है। सुरक्षा व्यवस्था में सुधार के साथ इन इलाकों में शिक्षा को लेकर नई उम्मीद जगी है।

लंबे समय तक माओवादी हिंसा के कारण कई ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों का संचालन प्रभावित रहा। शिक्षकों की पहुंच मुश्किल होने और ग्रामीणों में भय का माहौल रहने से बच्चों की पढ़ाई भी बाधित हुई। कई परिवारों के सामने बच्चों को स्कूल भेजना चुनौती बन गया था। अब हालात बदलने के साथ शिक्षा व्यवस्था को फिर से मजबूत करने की दिशा में प्रयास तेज हुए हैं।
दूरस्थ गांवों में स्कूलों के संचालन से बच्चों को अपने ही गांव और आसपास शिक्षा का अवसर मिलने लगा है। स्कूल परिसरों में बच्चों की चहल-पहल और शिक्षकों की मौजूदगी ग्रामीण इलाकों में बदलती तस्वीर का संकेत दे रही है। शिक्षा की यह वापसी केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीणों के बीच सुरक्षा और सामान्य जीवन को लेकर भरोसा भी बढ़ा रही है।
माओवादी हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में स्कूलों का दोबारा सक्रिय होना प्रशासन और सुरक्षा बलों के प्रयासों के साथ-साथ स्थानीय ग्रामीणों के लिए भी बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। लंबे समय तक हिंसा की छाया में रहे इन इलाकों में अब किताबें, कॉपियां और स्कूल की घंटियां बच्चों के भविष्य की नई कहानी लिख रही हैं।
शिक्षा की लौ से बदल रही तस्वीर
बस्तर समेत प्रदेश के दूरस्थ अंचलों में स्कूलों की सक्रियता से बच्चों के भविष्य को लेकर उम्मीद बढ़ी है। कभी जहां डर और दहशत का माहौल था, वहीं अब शिक्षा और विकास की गतिविधियां धीरे-धीरे अपनी जगह बना रही हैं। यह बदलाव माओवादी हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
