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थाने में कानून या ‘आरक्षक राज’? युवक को थाने बुलाकर मारपीट, कार छीनकर दूसरे को देने का आरोप

रायपुर। राजधानी रायपुर के टिकरापारा थाना पर गंभीर आरोप लगा है। ब्रम्हपुरी पुरानी बस्ती निवासी हर्षद चौबे (35) ने थाने में पदस्थ आरक्षक एस के यादव पर बिना किसी अपराध के जबरन थाने बुलाकर गाली-गलौच, मारपीट और उनकी कार जबरन छीनकर दूसरे व्यक्ति को दिलाने का सनसनीखेज आरोप लगाया है। पीड़ित हर्षद चौबे के अनुसार 9 मार्च 2026 को सुबह करीब 10:02 और 10:13 बजे आरक्षक एस के यादव ने अपने मोबाइल से फोन कर उन्हें टिकरापारा थाना बुलाया। हर्षद का कहना है कि वह सुबह 11:06 बजे थाने पहुंचे, जहां आरक्षक ने उन पर दबाव बनाते हुए कहा कि वह दिलहरन यादव को उसकी रकम या वाहन सौंप दें।

हर्षद चौबे का कहना है कि उन्होंने अपनी आर्थिक जरूरत और खराब सिविल स्कोर के कारण S.K. Finance से ऋण लेकर दिलहरन यादव के नाम पर स्विफ्ट डिजायर कार खरीदी थी, जिसकी किश्तें पिछले दो वर्षों से वह स्वयं चुका रहे हैं। इसके बावजूद आरक्षक ने उनकी बात सुने बिना कथित तौर पर गाली-गलौच और मारपीट की। पीड़ित का आरोप है कि आरक्षक एसके यादव ने धमकाते हुए उनकी “चमड़ी उधेड़ देने” तक की बात कही और जबरन उनकी कार का कब्जा दिलहरन यादव को दिला दिया। इतना ही नहीं, आरोप है कि वाहन सौंपने के बदले दिलहरन यादव से अवैध रूप से 10 हजार रुपये भी लिए गए। मामला यहीं नहीं रुका। हर्षद का कहना है कि थाने में मौजूद उनके 70 वर्षीय पिता मदन मोहन चौबे के साथ भी अभद्र व्यवहार और गाली-गलौच की गई। इस घटना से परिवार मानसिक और आर्थिक रूप से बेहद आहत है।

मारपीट के बाद हर्षद चौबे ने अपनी चोटों का इलाज डॉ. भीमराव अंबेडकर मेमोरियल हॉस्पिटल में कराया और मेडिकल रिपोर्ट भी शिकायत के साथ संलग्न की है। पीड़ित ने पुलिस अधिकारियों से शिकायत कर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने, आरोपी आरक्षक पर सख्त कार्रवाई करने और उनकी स्विफ्ट डिजायर कार का कब्जा वापस दिलाने की मांग की है। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या थाने कानून लागू करने के लिए हैं या दबाव बनाकर निजी विवाद सुलझाने के अड्डे बनते जा रहे हैं? यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह मामला पुलिस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

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