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टेंडरपुराण के अनिल चंदेल जी और कम रेट का महाभारत

रायपुर। छत्तीसगढ़ के सिंचाई विभाग की फाइलें इन दिनों पानी से नहीं, स्याही से लबालब हैं। और उस स्याही में सबसे गाढ़ा नाम अगर किसी का तैरता दिख रहा है तो वह है ठेकेदार अनिल चंदेल  जिन पर पूर्व मंत्री ननकीराम कंवर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे पत्र में गंभीर आरोपों की बारिश कर दी है। कहते हैं सिंचाई विभाग में पानी कम, लेकिन “प्रवाह” बहुत तेज़ है। टेंडर ऐसे बहते हैं जैसे बरसात में नाला, और दरें इतनी कम कर दी जाती हैं कि गंगा भी शर्मा जाए। कम रेट में टेंडर लेकर बड़े “रेट” की व्यवस्था करना आजकल ठेकेदारी का नया शोध बताया जा रहा है।

जनाब चंदेल पर आरोप है कि वे फाइलों में ऐसे हस्ताक्षर करते हैं मानो विभाग के स्थायी स्तंभ हों। हस्ताक्षर कब करना है, कहाँ करना है, किस रंग की स्याही से करना है  सबकी टाइमिंग किसी अदृश्य निर्देशक के इशारे पर तय होती है। यह निर्देशक कौन है, यह तो जांच ही बताएगी, पर कहानी में “प्रश्रय” शब्द बार-बार झांकता है। व्यंग की दुनिया में अगर कोई “कम रेट का महायोद्धा” घोषित हो, तो चंदेल जी का नाम अवश्य आएगा। कम रेट में टेंडर दिलवाने की कला ऐसी कि कार्यपालन अभियंता भी गणित भूल जाएँ। काम की गुणवत्ता पर सवाल उठें तो जवाब तैयार — “दर कम थी साहब!”

विभाग में अधिकांश राशि केंद्रीय मद की बताई जाती है, इसलिए अब बात डिजिटल दस्तावेजों के निरीक्षण और सीबीआई जांच तक पहुँच गई है। फाइलें कहती हैं कि हर पन्ने पर कुछ खास हस्ताक्षर मौजूद हैं। लगता है विभाग की हर धड़कन में एक ही स्याही दौड़ रही है। यह व्यंग किसी व्यक्ति की न्यायिक दोषसिद्धि नहीं, बल्कि उन आरोपों का प्रतिबिंब है जो सार्वजनिक पत्राचार में उठाए गए हैं। पर सवाल वही पुराना है अगर टेंडर कम रेट में है तो गुणवत्ता भी कम क्यों? अगर हस्ताक्षर सिर्फ औपचारिक हैं तो हर फाइल में वही क्यों? और अगर सब कुछ नियमपूर्वक है तो शिकायतों की धारा इतनी प्रबल क्यों? सिंचाई विभाग में पानी खेतों तक पहुँचे या न पहुँचे, पर आरोपों की धार राजधानी तक पहुँच चुकी है। अब देखना यह है कि जांच की धूप में “कम रेट का महाभारत” सूखता है या फिर स्याही और गहरी होती है।

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