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मनरेगा की पदयात्रा: जब हक़ पैरों से चलकर आवाज़ बनता है

बिलासपुर (तखतपुर)| ग्राम जोरापारा लोकतंत्र के मौसम में कुछ यात्राएँ बस दूरी तय नहीं करतीं, वे सत्ता की नींद भी नापती हैं। पंचायत जनसंपर्क पदयात्रा का सातवाँ दिन ऐसा ही दिन था—जहाँ ग्राम जोरापारा की धूल ने सवाल पूछे और मनरेगा ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

यह कोई “फीता-काटू-फोटो-खिंचवाऊ” कार्यक्रम नहीं था। यह वह यात्रा थी, जहाँ पैरों में चप्पलें थीं और आँखों में रोजगार की तलाश। मोछ से खैरी होते हुए गिरधौना तक पहुँची यह पदयात्रा दरअसल उन फाइलों की खोज थी, जो दफ्तरों में गुम होकर मजदूरों के पेट से गायब हो जाती हैं।

मनरेगा—जिसे कभी “गरीबों की गारंटी” कहा गया था—आज खुद गारंटी ढूँढ रहा है। काम है नहीं, भुगतान है नहीं, और जवाबदेही… वह तो शायद अगले बजट भाषण में मिले। ऐसे में कांग्रेस की यह पदयात्रा किसी राजनीतिक रस्म से ज़्यादा, सिस्टम को आईना दिखाने की कोशिश लगी।

प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज, पूर्व उपमुख्यमंत्री टी.एस. सिंह देव ,  विधायक देवेंद्र यादव , अटल श्रीवास्तव , दिलीप लहरिया , प्रदेश कांग्रेस महामंत्री सुबोध हरितवाल , सकलेन कामदार , ग्रामीण जिला अध्यक्ष महेन्द्र गंगोत्री, शहरी अध्यक्ष सिद्धांशु मिश्रा और ब्लॉक कांग्रेस कमेटी ग्रामीण के अध्यक्ष अभ्युदय प्रकाश ( जित्तू ) तिवारी —ये सभी नेता जब साथ चले, तो सवाल खुद-ब-खुद खड़े हो गए: अगर मनरेगा कागज़ों में ज़िंदा है, तो ज़मीन पर मरा क्यों दिखता है?

जिन हाथों को काम मिलना था, वे आज तख्तियाँ पकड़े खड़े हैं। जिन पैरों को खेतों में चलना था, वे सड़कों पर उतर आए हैं। और जिन योजनाओं को गरीब की रीढ़ कहा गया था, वे आज सत्ता की सुविधा के हिसाब से झुकाई जा रही हैं। यह पदयात्रा याद दिलाती है कि रोजगार कोई दया नहीं, अधिकार है। और अधिकार तब तक ज़िंदा रहते हैं, जब तक जनता उन्हें पैरों से चलाकर, आवाज़ में बदलती रहती है।

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