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इलाज के मंदिर या कागज़ों के कफन..?

रायपुर।रायपुर  की धरती पर इन दिनों अस्पतालों की एक नई बीमारी सामने आई है—“दस्तावेज़ीय लकवा”। जी हाँ, वही अस्पताल जो मरीजों की धड़कनें संभालने का दावा करते हैं, खुद एक पोर्टल पर अपनी जानकारी अपडेट करने में हांफ गए। आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत सेवा देने वाले ये 59 अस्पताल अब खुद ही “आईसीयू” में हैं—फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ वेंटिलेटर नहीं, बल्कि “HEM 2.0” का लॉगिन आईडी काम आ रहा है। सरकार ने कहा—“भैया, बस अपनी जानकारी अपडेट कर दो, कागज़ चढ़ा दो।” अस्पतालों ने सोचा—“इतना छोटा ऑपरेशन? हम तो दिल बदल देते हैं, ये तो सिस्टम बदलने की बात है!” और फिर शुरू हुआ टालमटोल का ऐसा इलाज, जिसमें डेडलाइन खुद ही दम तोड़ गई। 21 अस्पताल तो ऐसे निकले, जिन्होंने आवेदन तक नहीं किया। शायद ये वही डॉक्टर हैं जो मरीज को देखकर कहते होंगे—“पहले फीस जमा करो, फिर इलाज शुरू होगा”, लेकिन खुद जब बारी आई तो बोले—“अभी तो मूड नहीं है!” 12 अस्पतालों ने जानकारी अपडेट नहीं की, क्वेरी का जवाब नहीं दिया। लगता है इन्हें “मौन व्रत” की कोई विशेष ट्रेनिंग मिली है। मरीज पूछे—“डॉक्टर साहब, क्या हुआ?”
और ये जवाब दें—“क्वेरी पेंडिंग है, अगली सुनवाई में बताएंगे।”
बाकी 26 अस्पतालों का भुगतान और प्री-ऑथ रोक दिया गया।
यानी अब “इलाज पहले, भुगतान बाद में” की जगह “कागज़ पहले, इलाज बाद में” का नया सिद्धांत लागू हो गया है।
सवाल ये नहीं कि कार्रवाई क्यों हुई…

सवाल ये है कि जिन अस्पतालों को गरीबों की ज़िंदगी का सहारा बनना था, वे खुद नियमों के स्ट्रेचर पर क्यों लेटे मिले?
आयुष्मान योजना, जो गरीबों के लिए संजीवनी बन सकती थी, वहाँ कुछ अस्पतालों ने इसे “आय-उत्पादन योजना” समझ लिया। सेवा का स्थान सौदेबाज़ी ने ले लिया, और जिम्मेदारी का स्थान लापरवाही ने। जो संस्थान मरीजों को समय पर दवा न लेने पर डांटते हैं, वे खुद सरकारी निर्देशों की दवा लेना भूल गए।
जो कहते हैं “एक दिन की देरी भी खतरनाक है”, उन्होंने महीनों तक पोर्टल को वेंटिलेटर पर ही छोड़ दिया। अब जब सरकार ने सख्ती दिखाई, तो ये अस्पताल अचानक “बीमार” हो गए—
कोई कह रहा है “सिस्टम नहीं चला”,
कोई बोल रहा है “नेटवर्क नहीं था”


और कुछ तो शायद यही सोच रहे होंगे—“इतना भी क्या जल्दी है, मरीज कहीं भाग तो नहीं रहा!” लेकिन इस पूरे प्रकरण ने एक सच्चाई उजागर कर दी— अस्पतालों की असली परीक्षा ऑपरेशन थिएटर में नहीं, बल्कि जिम्मेदारी निभाने में होती है।
आखिर में एक सवाल जनता की ओर से— “जब अस्पताल खुद नियमों के आईसीयू में भर्ती हों, तो मरीज आखिर भरोसा किस पर करे?”

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