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साझा विरासत, साझा भविष्य: संग्रहालयों की भूमिका पर विशेषज्ञों ने रखे विचार

पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय (पीआरएसयू) के मानवविज्ञान अध्ययनशाला में अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस 2026 के अवसर पर विभाजित विश्व की एकजुटता में संग्रहालयों की भूमिका विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यक्रम में इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और प्रशासन से जुड़े विशेषज्ञों ने संग्रहालयों की बदलती भूमिका, सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण और विश्व शांति में उनकी उपयोगिता पर विस्तार से चर्चा की।

कार्यशाला के प्रथम सत्र में छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध पुरातत्वविद, संस्कृतिविद तथा बीआईडीआरसी के अध्यक्ष राहुल कुमार सिंह ने संग्रहालय और हमारा वैश्विक परिप्रेक्ष्य विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि विश्व के प्रमुख संग्रहालयों बोस्टन, लंदन और येल सहित अन्य संस्थानों में भारतीय संस्कृति से जुड़ी कलाकृतियां और दुर्लभ वस्तुएं प्रदर्शित की जा रही हैं। इन प्रदर्शनों के माध्यम से भारतीय सभ्यता और संस्कृति की पहचान विश्वभर में फैल रही है।

राहुल कुमार सिंह ने कहा कि बड़े संग्रहालय केवल वस्तुओं को संजोने के स्थान नहीं होते, बल्कि वे विभिन्न देशों और संस्कृतियों के बीच संवाद स्थापित करते हैं। जब कोई व्यक्ति किसी अन्य देश की सांस्कृतिक विरासत को देखता है, तो उसके भीतर उस संस्कृति के प्रति सम्मान और आत्मीयता की भावना विकसित होती है। यही भावना मानवता को एकसूत्र में पिरोने का काम करती है।

द्वितीय सत्र में प्रसिद्ध इतिहासकार, पुरातत्वविद और संस्कृति मर्मज्ञ प्रो. रमेंद्र नाथ मिश्र ने मध्य भारत का सांस्कृतिक गौरव संग्रहालय के विशेष परिप्रेक्ष्य विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ और मध्य भारत ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध क्षेत्र हैं, लेकिन संरक्षण के अभाव में अनेक महत्वपूर्ण धरोहरें नष्ट होने के कगार पर हैं।
प्रो. मिश्र ने कहा कि दुर्लभ पांडुलिपियां, पुरावशेष, लोक कलाएं और आदिवासी संस्कृति से जुड़ी सामग्रियां व्यवस्थित संरक्षण और दस्तावेजीकरण की प्रतीक्षा कर रही हैं। उन्होंने विद्यार्थियों और शोधार्थियों का आह्वान किया कि वे अपने आसपास मौजूद सांस्कृतिक धरोहरों को पहचानें, उनका संकलन करें और प्रशासन तक जानकारी पहुंचाकर उनके संरक्षण में योगदान दें।
कार्यक्रम की अध्यक्षता छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्य प्रशासनिक अधिकारी एवं पूर्व राज्य निर्वाचन आयुक्त डॉ. सुशील त्रिवेदी (आईएएस) ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि संग्रहालय शब्द की तुलना में म्यूजियम शब्द अधिक व्यापक अर्थ रखता है। यह केवल वस्तुओं के संग्रह तक सीमित नहीं, बल्कि चिंतन, अध्ययन, विश्लेषण और मानवीय विकास से जुड़ा एक बौद्धिक केंद्र है।

डॉ. त्रिवेदी ने वैश्विक परिदृश्य का उल्लेख करते हुए कहा कि 1980 के दशक में ग्लोबल विलेज की अवधारणा ने दुनिया को एक गांव के रूप में देखने की दृष्टि दी थी, लेकिन बाद के वर्षों में बाजारवाद और संकीर्ण राष्ट्रवाद ने विश्व को विभाजित करने का काम किया। उन्होंने कहा कि आज रूस-यूक्रेन और पश्चिम एशिया के संघर्ष इस विखंडन के गंभीर उदाहरण हैं।
उन्होंने कहा कि संग्रहालय हमें यह याद दिलाते हैं कि मानव इतिहास, संस्कृति, पीड़ा और संघर्ष मूलत साझा हैं। भारत-पाक विभाजन से जुड़े संग्रहालयों में संरक्षित वस्तुएं यह संदेश देती हैं कि दुख की कोई जाति या धर्म नहीं होता। इसी तरह आदिवासी समुदायों की उपलब्धियों को प्रदर्शित करने वाले संग्रहालय यह सिद्ध करते हैं कि हर संस्कृति मानव सभ्यता को समृद्ध बनाने में समान रूप से महत्वपूर्ण है।

कार्यशाला के संयोजक एवं मानवविज्ञान अध्ययनशाला के विभागाध्यक्ष प्रो. जितेंद्र कुमार प्रेमी ने स्वागत उद्बोधन में कहा कि संग्रहालय हमारी साझा विरासत के साक्षी हैं। उन्होंने कहा कि दुनिया के अलग-अलग देशों के प्राचीन उपकरणों, कलाकृतियों और सांस्कृतिक अवशेषों का अध्ययन यह दर्शाता है कि भौगोलिक दूरी के बावजूद मानव समाजों की जीवन शैली और रचनात्मकता में अद्भुत समानताएं रही हैं।

उन्होंने कहा कि संग्रहालय हमें यह समझाते हैं कि दर्द, भूख, आनंद, कला और विकास की आकांक्षा पूरी मानवता में समान है। इस दृष्टि से संग्रहालय अतीत को संरक्षित करने के साथ-साथ भविष्य के लिए शांति, सहअस्तित्व और सतत विकास का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं। कार्यक्रम के अंत में अतिथि व्याख्याता डॉ. तुलसी रानी ठाकरे ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। कार्यशाला में बड़ी संख्या में शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी और संस्कृति एवं इतिहास में रुचि रखने वाले लोग उपस्थित रहे। आयोजन ने यह संदेश दिया कि संग्रहालय केवल इतिहास के संरक्षक नहीं, बल्कि विभाजित विश्व को संवाद, समझ और संवेदनशीलता के माध्यम से जोड़ने वाले महत्वपूर्ण संस्थान हैं।

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