विश्व मानवविज्ञान दिवस पर जनजातीय अध्ययन की प्रासंगिकता पर विशेष व्याख्यान
पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय की मानवविज्ञान अध्ययनशाला में विश्व मानवविज्ञान दिवस के अवसर पर “जनजातीय अध्ययन एवं इसका मानवशास्त्रीय प्रासंगिकता और मूलभूत परिप्रेक्ष्य” विषय पर विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता डाॅ. टी. के. वैष्णव ने अपने व्याख्यान में कहा कि मानवविज्ञान जनजातीय समुदायों के समग्र अध्ययन के लिए प्रशासनिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। उन्होंने बताया कि मानवशास्त्री जनजातीय समाज के बीच रहकर उनके जीवन के विविध पहलुओं का अनुभवजन्य अध्ययन करते हैं, जिससे उनकी समस्याओं, आवश्यकताओं और अपेक्षाओं को समझने के साथ-साथ पारंपरिक ज्ञान, औषधीय ज्ञान और पारिस्थितिकीय ज्ञान जैसी महत्वपूर्ण विरासत सामने आती है। उन्होंने यह भी कहा कि जनजातियों को अनुसूचित जनजाति सूची में शामिल या अपवर्जित करने, नाम संबंधी त्रुटियों के सुधार तथा नृजातीय स्थिति के सत्यापन जैसे प्रशासनिक निर्णयों में मानवविज्ञान की अहम भूमिका रहती है, लेकिन वर्तमान समय में प्रशासनिक क्षेत्रों में इस विषय की अनदेखी चिंता का विषय है।
कार्यक्रम के संयोजक एवं विभागाध्यक्ष प्रो. जितेन्द्र कुमार प्रेमी ने स्वागत उद्बोधन में विश्व मानवविज्ञान दिवस के महत्व पर प्रकाश डालते हुए वर्ष 2026 की थीम “सेलिब्रेट, इंगेज एवं इंस्पायर” की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि इस वर्ष विश्वभर के मानववैज्ञानिक सांस्कृतिक विविधता और मानव ज्ञान को समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचाने के लिए प्रयासरत रहेंगे। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज विश्व में एक संस्कृति द्वारा दूसरी संस्कृति को कमतर आँकने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जिससे सामाजिक और सांस्कृतिक असंतुलन उत्पन्न हो रहा है। उन्होंने पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण और प्रसार की आवश्यकता पर भी बल दिया। विशिष्ट अतिथि डॉ. आई. सी. अग्रवाल ने जनजातीय अध्ययन में जनगणना आँकड़ों की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ब्रिटिश काल से लेकर आज तक जनजातीय विकास और समस्याओं के समाधान में जनगणना के आँकड़ों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसलिए जनजातीय अध्ययन में इन आँकड़ों का उपयोग अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए।
विभाग के वरिष्ठ प्राध्यापक डाॅ. अशोक प्रधान ने अपने उद्बोधन में कहा कि मानवविज्ञान विषय जनजातीय विकास और प्रशासन के लिए अत्यंत उपयोगी रहा है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में प्रशासनिक स्तर पर इसके महत्व को नजरअंदाज किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि आँकड़ों और तथ्यों को राजनीतिक सुविधा के अनुसार प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति अकादमिक और प्रशासनिक दोनों ही दृष्टि से चिंताजनक है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डाॅ. अरुण कुमार ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में मानवविज्ञान दिवस की आवश्यकता, उद्देश्य और महत्व पर विस्तार से विचार रखते हुए कहा कि मानवविज्ञान जैसे उपयोगी विषय के प्रति समाज में जागरूकता का अभाव मानव प्रगति के साथ-साथ विश्व शांति के लिए भी बाधक है। उन्होंने सांस्कृतिक सापेक्षवाद के सिद्धांत पर जोर देते हुए कहा कि कोई भी संस्कृति अपने आप में न तो उच्च होती है और न निम्न, बल्कि प्रत्येक संस्कृति अपने परिवेश में पूर्ण होती है। इसलिए किसी भी समुदाय की संस्कृति को उसके अपने दृष्टिकोण से समझना आवश्यक है। कार्यक्रम में विद्यार्थियों, शोधार्थियों और संकाय सदस्यों की सक्रिय सहभागिता रही तथा जनजातीय अध्ययन के समसामयिक मुद्दों पर सार्थक चर्चा हुई।

