आरटीआई में जानकारी देने से इनकार, आखिर जिला पुनर्वास केंद्र में ऐसा क्या छिपाया जा रहा है?
बिलासपुर। बिलासपुर के जिला पुनर्वास केंद्र (समाज कल्याण विभाग) में सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत मांगी गई जानकारी देने से कार्यालय द्वारा इनकार किए जाने के बाद कई सवाल खड़े हो गए हैं। जनसूचना अधिकारी की ओर से जारी पत्र में वर्ष 2023-24 और 2024-25 की केस बुक तथा उससे जुड़े दस्तावेजों की जानकारी देने से मना करते हुए इसे आरटीआई की धारा 11(1) के तहत तीसरे पक्ष की गोपनीय जानकारी बताया गया है।
हालांकि इस जवाब के बाद पारदर्शिता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। जानकारों का कहना है कि सरकारी कार्यालयों में खर्च होने वाली राशि, योजनाओं के क्रियान्वयन और केस से जुड़े रिकॉर्ड आमतौर पर सार्वजनिक जानकारी की श्रेणी में आते हैं। ऐसे में जानकारी देने से इनकार करना कई शंकाओं को जन्म देता है।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर ऐसा क्या है जिसे सार्वजनिक करने से रोका जा रहा है। यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ है तो जानकारी देने में हिचकिचाहट क्यों दिखाई जा रही है। सामाजिक संगठनों और आरटीआई कार्यकर्ताओं का मानना है कि जब भी किसी कार्यालय द्वारा सूचना देने से बचने की कोशिश की जाती है, तब अक्सर वित्तीय गड़बड़ी, फर्जी खर्च या अनियमितताओं की आशंका और मजबूत हो जाती है।
मामले में यह भी उल्लेख किया गया है कि निराश्रित निधि के तहत स्वीकृत बजट और मदवार खर्च से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध कराए जा सकते हैं, लेकिन केस बुक और उससे जुड़े रिकॉर्ड देने से इनकार किया गया है। ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि खर्च से जुड़े दस्तावेज दिए जा सकते हैं तो फिर मूल रिकॉर्ड को गोपनीय बताने का आधार क्या है।
सूचना के अधिकार का उद्देश्य ही सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। लेकिन जब विभाग ही जानकारी देने से पीछे हटने लगें, तो स्वाभाविक रूप से यह संदेह पैदा होता है कि कहीं न कहीं कोई गड़बड़ी जरूर है। अब देखने वाली बात यह होगी कि इस मामले में आगे क्या स्थिति बनती है और क्या इस विषय में उच्च स्तर पर अपील या जांच की मांग उठती है।


